केंद्र व राज्य सरकारों के मंत्रालय और विभाग आरटीआई (राइट टू इनफॉर्मेशन) में पूछे जाने वाले अजीबो-गरीब सवालों से परेशान हैं. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2005 से लेकर 2016 तक करीब 2.44 करोड़ आरटीआई याचिकाएं लगाई गई हैं.बताया जा रहा है कि हर दिन सरकारी विभागों में करीब 4800 आरटीआई याचिकाएं लगाईं जाती हैं. इनमें से 90 प्रतिशत याचिकाएं शहरों से तो 14 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों से लगाईं जाती हैं.मंत्रालयों की बात की जाए तो सबसे ज्यादा 1.55 लाख आरटीआई याचिकाएं वित्त मंत्रालय के पास आई है. वहीं, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पास 1.11 लाख याचिकाएं आई हैं.पीएमओ भी आरटीआई के सवालों से अछूता नहीं है. यहां हर दिन तकरीबन 1500 याचिकाएं आती हैं. जिनमें प्रधानमंत्री के खान-पान से लेकर उनके इंटरनेट की स्पीड पर भी सवाल पूछे जाते हैं.सरकारी दफ्तरों में आलम यह है कि सरकारी बाबू आरटीआई में पूछे जाने वाले सवालों से परेशान तो है ही. साथ ही उन्हें कम तय समय में इनका जवाब भी देना होता है.एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र के सरकारी विभागों में 2006 से लेकर 2015 तक 54,95,788 आरटीआई याचिकाएं आई हैं. इसके अलावा तमिलनाडु को छोड़कर केंद्र और राज्य सरकारों से RTI के तहत 13,48,457 सेकंड अपील की गई है.ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के राम नाथ झा के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड और सिक्किम आरटीआई पर एनुअल रिपोर्ट नियमित रूप से नहीं बना रहे हैं. जिसकी वजह से आरटीआई के सही प्रभाव को नहीं समझा जा पा रहा है.
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